Saturday, September 29, 2012
Monday, September 17, 2012
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण दल
गुवाहाटी का दौरा 18-19 सितम्बर 2012 को
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण- एनडीएमए के सदस्य श्री वी.के. दुग्गल और श्री के.एम. सिंह 18-19 सितम्बर 2012 को गुवाहाटी के दौरे पर जायेंगे, जिसमें वे आपदा प्रबंधन संबंधी प्रभारी मंत्री, मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और असम के अन्य वरिष्ठ आधिकारियों के साथ असम में हाल में आई बाढ़ की स्थिति की समीक्षा करेंगे। एनडीएमए दल इसका भी विश्लेषण करेगा कि भविष्य में मौजूदा अग्रिम चेतावनी प्रणाली में सुधार, तैयारी तथा संकट की स्थिति में कमी लाने के क्या उपाय किये जा सकते हैं तथा भारत सरकार द्वारा इसके लिए क्या सहायता मुहैया कराई जा सकती है।
एनडीएमए के इस दल के साथ श्री बी.एस. अग्रवाल, संयुक्त सलाहकार (मिटिगेशन प्रोजेक्ट्स) और डॉक्टर एस.के. जेना, वरिष्ठ शोध अधिकारी भी जायेंगे।
समीक्षा बैठक में श्री सी.के. अग्रवाल, मुख्य अभियंता, शिलांग/गुवाहाटी के केन्द्रीय जल आयोग कार्यालय से दीपक कुमार, अधीक्षण अभियंता (समन्वय), भारतीय मौसम विभाग गुवाहाटी के श्री अवदेश कुमार, गुवाहाटी के प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान के फैकल्टी सदस्य, ब्रह्मपुत्र बोर्ड के अध्यक्ष काशीन्द्र यादव, पूर्वोत्तर अंतरिक्ष केन्द्र शिलांग के डॉक्टर दिगम्बर बर्मन और राष्ट्रीय आपदा कार्रवाई बल बटालियन के कमांडेंट श्री ए.के. सिंह भी भाग लेंगे। (पत्र सूचना कार्यालय) 17-सितम्बर-2012 18:40 IST
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| NDMA |
एनडीएमए के इस दल के साथ श्री बी.एस. अग्रवाल, संयुक्त सलाहकार (मिटिगेशन प्रोजेक्ट्स) और डॉक्टर एस.के. जेना, वरिष्ठ शोध अधिकारी भी जायेंगे।
समीक्षा बैठक में श्री सी.के. अग्रवाल, मुख्य अभियंता, शिलांग/गुवाहाटी के केन्द्रीय जल आयोग कार्यालय से दीपक कुमार, अधीक्षण अभियंता (समन्वय), भारतीय मौसम विभाग गुवाहाटी के श्री अवदेश कुमार, गुवाहाटी के प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान के फैकल्टी सदस्य, ब्रह्मपुत्र बोर्ड के अध्यक्ष काशीन्द्र यादव, पूर्वोत्तर अंतरिक्ष केन्द्र शिलांग के डॉक्टर दिगम्बर बर्मन और राष्ट्रीय आपदा कार्रवाई बल बटालियन के कमांडेंट श्री ए.के. सिंह भी भाग लेंगे। (पत्र सूचना कार्यालय) 17-सितम्बर-2012 18:40 IST
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NDMA Team to Visit Guwahati
To review the recent floods in Assam
Shri V.K. Duggal and Shri K.M. Singh, members of National Disaster Management Authority (NDMA), will be visiting Guwahati on September 18-19, 2012 to review the recent floods in Assam with the Minister incharge of Disaster Management, Chief Secretary, DGP and other senior officers of Assam. The team will also analyse as to what can be done to improve the existing early warning, preparedness response and mitigation systems for future and what assistance can be provided by the Govt. of India in this regard.
The Members will be accompanied by Shri B.S. Aggarwal, Jt. Advisor (Mitigation Projects) and Dr. S.K. Jena, Senior Research Officer.
S/Shri C.K. Agrawal, Chief Engineer, Deepak Kumar, Superintendent Engineer (Coordination) from the office of Central Water Commission, Shillong/Guwahati, Shri Avdesh Kumar from India Meteorological Department, Guwahati, Faculty Member from Administrative Training Institute, Guwahati and Shri Kashindra Yadav, Chairman, Brahmaputra Board and Dr. Digmber Barman from North Eastern Space Application Centre, Shillong, and Shri A.K. Singh, Commandant, NDRF Batallion, Guwahati will also be attending the meeting.(PIB) 17-September-2012 17:43 IST
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| NDMA |
The Members will be accompanied by Shri B.S. Aggarwal, Jt. Advisor (Mitigation Projects) and Dr. S.K. Jena, Senior Research Officer.
S/Shri C.K. Agrawal, Chief Engineer, Deepak Kumar, Superintendent Engineer (Coordination) from the office of Central Water Commission, Shillong/Guwahati, Shri Avdesh Kumar from India Meteorological Department, Guwahati, Faculty Member from Administrative Training Institute, Guwahati and Shri Kashindra Yadav, Chairman, Brahmaputra Board and Dr. Digmber Barman from North Eastern Space Application Centre, Shillong, and Shri A.K. Singh, Commandant, NDRF Batallion, Guwahati will also be attending the meeting.(PIB) 17-September-2012 17:43 IST
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Thursday, August 23, 2012
देश की एकता-अखंडता खतरे में ?//राजीव गुप्ता
भारत-विभाजन जैसी वीभत्स त्रासदी से सबक क्यों नहीं?
भारत इस समय किसी बड़ी संभावित
साम्प्रदायिक-घटना रूपी ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा हुआ प्रतीत हो रहा है.
देश की एकता-अखंडता खतरे में पड़ती हुई नजर आ रही है. देश की संसद में भी
आतंरिक सुरक्षा को लेकर तथा सरकार की विश्वसनीयता और उसकी कार्यप्रणाली पर
प्रश्नचिंह खड़े किये जा रहे है. सांसदों की चीख-पुकार से सरकार की अब जाकर
नीद खुली है. सरकार ने आनन्-फानन में देश में मचे अब तक के तांडव को
पाकिस्तान की करतूत बताकर अपना पल्ला झड़ने की कोशिश करते हुए दोषियों के
खिलाफ कार्यवाही करने के नाम पर भारत के गृहमंत्री ने पाकिस्तान के
गृहमंत्री से रविवार को बात कर एक रस्म अदायगी मात्र कर दी और प्रति उत्तर
में पाकिस्तान ने अपना पल्ला झाड़ते हुए भारत को आरोप-प्रत्यारोप का खेल
खेलना बंद करने की नसीहत देते हुए यहाँ तक कह दिया कि भारत के लिए सही यह
होगा कि वह अपने आंतरिक मुद्दों पर पर ध्यान दे और उन पर काबू पाने की
कोशिश करे. अब सरकार लाख तर्क दे ले कि इन घटनाओ के पीछे पाकिस्तान का हाथ
है, परन्तु सरकार द्वारा समय पर त्वरित कार्यवाही न करने के कारण जनता उनके
इन तर्कों से संतुष्ट नहीं हो रही है इसलिए अब प्रश्न चिन्ह सरकार की नियत
पर खड़ा हो गया है क्योंकि असम में 20 जुलाईं से शुरू हुईं सांप्रादायिक
हिंसा जिसमे समय रहते तरुण गोगोईं सरकार ने कोई बचाव-कदम नहीं उठाए मात्र
अपनी राजनैतिक नफ़ा-नुक्सान के हिसाब - किताब में ही लगी रही. परिणामतः वहां
भयंकर नर-संहार हुआ और वहा के लाखो स्थानीय निवासियों ने अपना घर-बार
छोड़कर राहत शिवरों में रहने के लिए मजबूर हो गए.
असम के विषय में यह बात जग-जाहिर है कि असम और बंग्लादेश के मध्य की 270 किलोमीटर लम्बी सीमा में से लगभग 50 किलोमीटर तक की सीमा बिलकुल खुली है जहा से अवैध घुसपैठ होती है और इन्ही अवैध घुसपैठों के चलते लम्बे समय से वहा की स्थानीय जनसंख्या का अनुपात लगातार नीचे गिरता जा रहा है. यह भी सर्वविदित है कि असम में हुई हिंसा हिन्दू बनाम मुस्लिम न होकर भारतीय बनाम बंग्लादेशी घुसपैठ का है. जिसकी आवाज़ कुछ दिन पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी बुलंद की थी और यह सरकार से मांग की थी कि असम से पलायन कर गए लोगों की स्थिति कश्मीरी पंडितों जैसी नहीं होनी चाहिए . ध्यान देने योग्य है कि 1985 में तत्कालीन प्राधानमंत्री राजीव गांधी के समय असम में यह समझौता हुआ था कि बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाय परन्तु इस विषय के राजनीतिकरण के चलते दुर्भाग्य से इस समझौते के प्रावधानों को कभी भी गम्भीरता से लागू नहीं किया गया. परिणामतः असम में 20 जुलाईं से उठी चिंगारी ने आज पूरे देश को अपनी चपेट में लिया है.
दक्षिण भारत के दो प्रमुख राज्यों आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के साथ-साथ महाराष्ट्र से उत्तर-पूर्व के हजारो छात्रों का वहा से पलायन हो रहा है और अब यह सिलसिला भारत के दूसरो शहरो में भी शुरू हो जायेगा इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. प्रधानमंत्री संसद में यह लाख तर्क देते रहे कि हर देशवासी की तरह पूर्वोत्तर के लोगों को देश के किसी भी भाग में रहने, पढ़ाईं करने और जीविकोपार्जन करने का अधिकार है. पर सच्चाई उनके इस तर्क से अब कोसों दूर हो चुकी है. देश की जनता को उनके तर्क पर अब विश्वास नहीं हो रहा है. सरकार के सामने अब मूल समस्या यही है कि वो जनता को विश्वास कैसे दिलाये. भारतवर्ष सदियों से अपने को विभिन्नता में एकता वाला देश मानता आया है क्योंकि यहाँ सदियों से अनेक मत-पन्थो के अनुयायी रहते आये है. परन्तु समस्या विकराल रूप तब धारण कर लेती है जब एक विशेष समुदाय के लोग देश की शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में अपना विश्वास करना छोड़ कर भारत की एकता - अखंडता पर प्रहार करने लग जाते है और वहा के दूसरे समुदाय की धार्मिक तथा राष्ट्रभक्ति की भावनाओ को कुचलने का प्रयास करने लग जाते है क्योंकि हर साम्प्रदायिक-घटना किसी समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय की भावनाओ के आहत करने से ही उपजती है. अभी हाल में ही दिल्ली के सुभाष पार्क , मुम्बई के आज़ाद मैदान, कोसीकला, बरेली जैसे शहरो में हुई घटनाये इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है.
मुम्बई में बने शहीदों के स्मारकों को तोडा गया, मीडिया की गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया. पुलिस पर हमला किया गया जिसमे गंभीर रूप से घायल हो गए. इतना ही नहीं यह आग रांची, बैंगलोर जैसे अनेक शहरों तक जा पहुची यहाँ तक की उत्तर प्रदेश के लखनऊ, इलाहाबाद जैसे कई शहर भी इस आग में झुलस गए परिणामतः प्रशासन द्वारा वहा कर्फ्यू लगा दिया गया. असल में अब समस्या यह है नहीं किस राज्य में किस समुदाय द्वारा सांप्रदायिक - हिंसा की जा रही है अथवा उन्हें ऐसा करने के लिए कौन उकसा रहा है जिससे उन्हें ऐसा करने का बढ़ावा मिल रहा है अपितु अब देश के सम्मुख विचारणीय प्रश्न यह है कि इतिहास अपने को दोहराना चाह रहा है क्या ? सरकार भारत-विभाजन जैसी वीभत्स त्रासदी वाले इतिहास से सबक क्यों नहीं ले रही है ? क्या सरकार खिलाफत-आन्दोलन और अलास्का की घटना की प्रतिक्रिया स्वरुप भारत में हुई साम्प्रदयिक-घटना जैसी किसी बड़ी घटना का इंतज़ार कर रही है ? यह बात सरकार को ध्यान रखनी चाहिए कि जो देश अपने इतिहास से सबक नहीं लिया करता उसका भूगोल बदल जाया करता है इस बात का प्रमाण भारत का इतिहास है. एक समुदाय द्वारा देश में मचाये जा रहे उत्पात पर निष्पक्ष कही जाने वाली मीडिया की अनदेखी और सरकार की चुप्पी से भारत के बहुसंख्यको में अभी काफी मौन-रोष पनप रहा है इस बात का सरकार और मीडिया को ध्यान रखना चाहिए और समय रहते इस समस्या को नियंत्रण में करने हेतु त्वरित कार्यवाही करना चाहिए.
यह एक कटु सत्य है कि विभिन्न समुदायों के बीच
शांति एवं सौहार्द स्थापित करने की राह में सांप्रदायिक दंगे एक बहुत बड़ा
रोड़ा बन कर उभरते है और साथ ही मानवता पर ऐसा गहरा घाव छोड़ जाते है जिससे
उबरने में मानव को कई - कई वर्ष तक लग जाते है. ऐसे में समुदायों के बीच
उत्पन्न तनावग्रस्त स्थिति में किसी भी देश की प्रगति कदापि संभव नहीं है.
आम - जन को भी देश की एकता – अखंडता और पारस्परिक सौहार्द बनाये रखने के
लिए ऐसी सभी देशद्रोही ताकतों को बढ़ावा न देकर अपनी सहनशीलता और धैर्य का
परिचय देश के विकास में अपना सहयोग करना चाहिए. आज समुदायों के बीच गलत
विभाजन रेखा विकसित की जा रही है. विदेशी ताकतों की रूचि के कारण स्थिति
और बिगड़ती जा रही है जो भारत की एकता को बनाये रखने में बाधक है. अतः अब
समय आ गया है देश भविष्य में ऐसी सांप्रदायिक घटनाये न घटे इसके लिए जनता
स्वयं प्रतिबद्ध हो.
- लेखक:राजीव गुप्ता, 9811558925
पंजाब स्क्रीन में भी देखें
दिल्ली स्क्रीन में देखें: एक ही जन्म में दो जन्म का कारावास
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| तस्वीर जनोक्ति से साभार |
असम के विषय में यह बात जग-जाहिर है कि असम और बंग्लादेश के मध्य की 270 किलोमीटर लम्बी सीमा में से लगभग 50 किलोमीटर तक की सीमा बिलकुल खुली है जहा से अवैध घुसपैठ होती है और इन्ही अवैध घुसपैठों के चलते लम्बे समय से वहा की स्थानीय जनसंख्या का अनुपात लगातार नीचे गिरता जा रहा है. यह भी सर्वविदित है कि असम में हुई हिंसा हिन्दू बनाम मुस्लिम न होकर भारतीय बनाम बंग्लादेशी घुसपैठ का है. जिसकी आवाज़ कुछ दिन पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी बुलंद की थी और यह सरकार से मांग की थी कि असम से पलायन कर गए लोगों की स्थिति कश्मीरी पंडितों जैसी नहीं होनी चाहिए . ध्यान देने योग्य है कि 1985 में तत्कालीन प्राधानमंत्री राजीव गांधी के समय असम में यह समझौता हुआ था कि बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाय परन्तु इस विषय के राजनीतिकरण के चलते दुर्भाग्य से इस समझौते के प्रावधानों को कभी भी गम्भीरता से लागू नहीं किया गया. परिणामतः असम में 20 जुलाईं से उठी चिंगारी ने आज पूरे देश को अपनी चपेट में लिया है.
दक्षिण भारत के दो प्रमुख राज्यों आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के साथ-साथ महाराष्ट्र से उत्तर-पूर्व के हजारो छात्रों का वहा से पलायन हो रहा है और अब यह सिलसिला भारत के दूसरो शहरो में भी शुरू हो जायेगा इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. प्रधानमंत्री संसद में यह लाख तर्क देते रहे कि हर देशवासी की तरह पूर्वोत्तर के लोगों को देश के किसी भी भाग में रहने, पढ़ाईं करने और जीविकोपार्जन करने का अधिकार है. पर सच्चाई उनके इस तर्क से अब कोसों दूर हो चुकी है. देश की जनता को उनके तर्क पर अब विश्वास नहीं हो रहा है. सरकार के सामने अब मूल समस्या यही है कि वो जनता को विश्वास कैसे दिलाये. भारतवर्ष सदियों से अपने को विभिन्नता में एकता वाला देश मानता आया है क्योंकि यहाँ सदियों से अनेक मत-पन्थो के अनुयायी रहते आये है. परन्तु समस्या विकराल रूप तब धारण कर लेती है जब एक विशेष समुदाय के लोग देश की शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में अपना विश्वास करना छोड़ कर भारत की एकता - अखंडता पर प्रहार करने लग जाते है और वहा के दूसरे समुदाय की धार्मिक तथा राष्ट्रभक्ति की भावनाओ को कुचलने का प्रयास करने लग जाते है क्योंकि हर साम्प्रदायिक-घटना किसी समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय की भावनाओ के आहत करने से ही उपजती है. अभी हाल में ही दिल्ली के सुभाष पार्क , मुम्बई के आज़ाद मैदान, कोसीकला, बरेली जैसे शहरो में हुई घटनाये इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है.
मुम्बई में बने शहीदों के स्मारकों को तोडा गया, मीडिया की गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया. पुलिस पर हमला किया गया जिसमे गंभीर रूप से घायल हो गए. इतना ही नहीं यह आग रांची, बैंगलोर जैसे अनेक शहरों तक जा पहुची यहाँ तक की उत्तर प्रदेश के लखनऊ, इलाहाबाद जैसे कई शहर भी इस आग में झुलस गए परिणामतः प्रशासन द्वारा वहा कर्फ्यू लगा दिया गया. असल में अब समस्या यह है नहीं किस राज्य में किस समुदाय द्वारा सांप्रदायिक - हिंसा की जा रही है अथवा उन्हें ऐसा करने के लिए कौन उकसा रहा है जिससे उन्हें ऐसा करने का बढ़ावा मिल रहा है अपितु अब देश के सम्मुख विचारणीय प्रश्न यह है कि इतिहास अपने को दोहराना चाह रहा है क्या ? सरकार भारत-विभाजन जैसी वीभत्स त्रासदी वाले इतिहास से सबक क्यों नहीं ले रही है ? क्या सरकार खिलाफत-आन्दोलन और अलास्का की घटना की प्रतिक्रिया स्वरुप भारत में हुई साम्प्रदयिक-घटना जैसी किसी बड़ी घटना का इंतज़ार कर रही है ? यह बात सरकार को ध्यान रखनी चाहिए कि जो देश अपने इतिहास से सबक नहीं लिया करता उसका भूगोल बदल जाया करता है इस बात का प्रमाण भारत का इतिहास है. एक समुदाय द्वारा देश में मचाये जा रहे उत्पात पर निष्पक्ष कही जाने वाली मीडिया की अनदेखी और सरकार की चुप्पी से भारत के बहुसंख्यको में अभी काफी मौन-रोष पनप रहा है इस बात का सरकार और मीडिया को ध्यान रखना चाहिए और समय रहते इस समस्या को नियंत्रण में करने हेतु त्वरित कार्यवाही करना चाहिए.
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| लेखक:राजीव गुप्ता |
- लेखक:राजीव गुप्ता, 9811558925
इसी कलम से:
भारत-विभाजन जैसी वीभत्स त्रासदी से सबक क्यों नहीं?पंजाब स्क्रीन में भी देखें
दिल्ली स्क्रीन में देखें: एक ही जन्म में दो जन्म का कारावास
देश की एकता-अखंडता खतरे में ?//राजीव गुप्ता
Monday, August 20, 2012
Urgent Appeal to Media and Press in the North east
Appeal on behalf of the north east community
This
is an urgent appeal on behalf of the north east community living in
Bangalore and other cities outside of the north east. As you are aware
the situation in many cities has been tense fuelled by rumours of
potential violence as well as stray incidents, which have resulted in
many people leaving these states and returning to their respective homes
in Assam and elsewhere.
As the trains start arriving in Assam and elsewhere there will be an urge to interview people to get a sense of what has been happening and we fear that some of thee stories may be based not on facts but on hearsay and rumour. We urge the media to exercise refrain in the way they carry the stories. The reality of the situation in Bangalore for instance is that community leaders and representatives from the north east and the Muslim community have been hard at work to build trust between these communities and restore peace here. If there any backlash that takes place in Assam as a result of the stories that are carried there is a danger of there being repercussions in cities like Bangalore.
We urge the media to be aware of the important role that they have in trying to bring back trust within all the communities and report without sensationalizing anything which could be used by troublemakers. The media in the north east has played a very vital role in promoting democratic values and ensuring the safety and security of people and we hope that at this critical hour all of you will join hands in promoting a more peaceful and stable future.
Friends and members of the north east community in Bangalore. (Courtesy:kracktivist)
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| Courtesy photo |
As the trains start arriving in Assam and elsewhere there will be an urge to interview people to get a sense of what has been happening and we fear that some of thee stories may be based not on facts but on hearsay and rumour. We urge the media to exercise refrain in the way they carry the stories. The reality of the situation in Bangalore for instance is that community leaders and representatives from the north east and the Muslim community have been hard at work to build trust between these communities and restore peace here. If there any backlash that takes place in Assam as a result of the stories that are carried there is a danger of there being repercussions in cities like Bangalore.
We urge the media to be aware of the important role that they have in trying to bring back trust within all the communities and report without sensationalizing anything which could be used by troublemakers. The media in the north east has played a very vital role in promoting democratic values and ensuring the safety and security of people and we hope that at this critical hour all of you will join hands in promoting a more peaceful and stable future.
Friends and members of the north east community in Bangalore. (Courtesy:kracktivist)
Monday, August 13, 2012
Talking to the riot victims
The Union Home Minister, Shri Sushil Kumar Shinde and the Chairperson, National Advisory Council, Smt. Sonia Gandhi along with the Assam Chief Minister, Shri Tarun Gogoi talking to the riot victims, at Deborgaon Relief camp, in Kokrajhar district of Assam on August 13, 2012.. (PIB photo) 13-August-2012
Saturday, August 11, 2012
Let us wait and prey for the the peace.
Advani's statement will create hurdles:Assam minister warned
Dhubri (Assam): Aug 9:2012:Reacting to the BJP leader LK Advani's statement yesterday in Parliament; Assam Health and Education Minister Himanta Biswa Sarma today alleged that it would create further hurdles in the way of peace returning to lower Assam.
Headded that the people of both the communities have taken the initiative to create trust among each other and such statements by prominent politicians at this moment will lead to further complications," Sarma told reporters here.
BJP leader Advani had said that the violence in Assam should not be seen as a communal incident and no one should regard it as a Hindu versus Muslim affair or a tribal versus non-tribal one as the basic issue is between Indians and infiltrators from across the border.
"The conflict is a humanitarian problem and we should not bring politics into it. Advani has approached the entire problem from the point of view election politics with an eye on getting votes in the next elections," Sarma said.
''We had expected the senior leader to make a statement that will help in restoring peace and confidence among the Bodos and the minorities; instead he brought politics into it," he added. The problem between the Bodos and Muslims would be soon resolved, he said, through "dialogue and promotion of mutual trust and politicians should keep out of it". Let us wait and prey for the the peace.
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Dhubri (Assam): Aug 9:2012:Reacting to the BJP leader LK Advani's statement yesterday in Parliament; Assam Health and Education Minister Himanta Biswa Sarma today alleged that it would create further hurdles in the way of peace returning to lower Assam.
Headded that the people of both the communities have taken the initiative to create trust among each other and such statements by prominent politicians at this moment will lead to further complications," Sarma told reporters here.
BJP leader Advani had said that the violence in Assam should not be seen as a communal incident and no one should regard it as a Hindu versus Muslim affair or a tribal versus non-tribal one as the basic issue is between Indians and infiltrators from across the border.
"The conflict is a humanitarian problem and we should not bring politics into it. Advani has approached the entire problem from the point of view election politics with an eye on getting votes in the next elections," Sarma said.
''We had expected the senior leader to make a statement that will help in restoring peace and confidence among the Bodos and the minorities; instead he brought politics into it," he added. The problem between the Bodos and Muslims would be soon resolved, he said, through "dialogue and promotion of mutual trust and politicians should keep out of it". Let us wait and prey for the the peace.
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